गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मोदी का जाना तो तय है..



आईपीएल समाप्ति पर है और इसी के साथ ललित मोदी का स्वर्णिम काल भी खत्म होता नजर आ रहा है. तीन साल पहले, 2008 में, विश्व क्रिकेट को आईपीएल की अनूठी सौगात देकर इतिहास के पन्नों में सुनहरों अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराने वाले मोदी को अब एक खलनायक की तरह रूखसत करने का प्रयास किया जा रहा है. उनके खिलाफ बीसीसीआई है, क्रिकेट के मैदान में जलवे बिखेर चुके कईं भूतपूर्व खिलाड़ी हैं. यहां तक कि भारतीय राजनीति में भी इन दिनों ललित मोदी को बर्खास्त किए जाने की मांग ही सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. राजनेता हो या राजनीतिक पार्टियां, बीसीसीआई के आला अधिकारी हो या पिफर भूतपूर्व खिलाड़ी, हर कोई इन दिनों मोदी को एक खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करने की मुहिम में जुटा हुआ है. सबकी राय एक जैसी ही हैः मोदी एक भ्रष्टाचारी है, जिन्होंने क्रिकेट और आईपीएल में भ्रष्टाचार किया है. सो, उन्हें आईपीएल के चैयरमेन की कुर्सी पर बैठे रहने का कोई हक नहीं है.
तो क्या हकीकत में ऐसा है? क्या मोदी ने वाकई में भारतीय क्रिकेट का इस कदर नुकसान कर दिया है कि उन्हें बर्खास्त करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ? जवाब होगा, नहीं. मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिससे भारतीय क्रिकेट बदनाम हो. और फिर अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया भी है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए. पहले उनके द्वारा किए गए अपराधों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, उसके बाद उन्हें पद से बर्खास्त करना चाहिए.
हाल फिलहाल तो मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने बरसों से सुस्त पड़ी बीसीसीआई को पुनर्जीवित करने का काम किया है. मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने आईपीएल जैसी पैसे बनाने वाली मशीन तैयार करके भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदलने की कोशिश की है. भारतीय खेलप्रेमियों को वह समय याद करना चाहिए, जब बीसीसीआई के पास अपने चयनकर्ताओं को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं हुआ करतेे थे. यह ज्यादा पुरानी बात नहीं, बल्कि पांच या छह साल पहले की बात है, जब देश की राष्ट्रीय टीम चुनने वाले चयनकर्ता भी अवैतनीक कर्मचारी की तरह काम करते थे. वहीं बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बन गया है, तो इसमें मोदी द्वारा रची गई आईपीएल की अहम भूमिका है. आज अगर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भारत में खेलने के लिए अपनी राष्ट्रीय टीमों को छोड़ रहे हैं, तो यह आईपीएल की वजह से ही है. आज अगर धेानी, सहवाग और युवराज जैसे खिलाड़ियों को आईपीएल में डेढ़ महीनें खेलने के एवज में पांच करोड़ रूपए मिल रहे हैं, तो यह भी मोदीे की आईपीएल की वजह से ही है.
लेकिन बीसीसीआई को यह रास नहीं आ रहा है. बीसीसीआई में बरसों से प्रभुत्व जमाएं बैठे उन उदासीन और निकम्मे पदाधिकारियों को यह रास नहीं आ रहा है कि मोदी नामक कोई शख्स उन्हें ‘सिस्टम’ सुधारने पर उतारू है. आजादी के बाद से भारत की सबसे बड़ी व्यथा यही है कि यहां पर सिस्टम को सुधारने की कोषिष करने वालों को कभी स्वीकार नहीं किया गया. फिर चाहे वह जयप्रकाश नारायण हो, रजनीश ओशो हो या फिर अब ललित मोदी. जयप्रकाश ने राजनीति का सिस्टम सुधारने की कोशिश की, किनारे लगा दिए गए. ओशों ने यौन व्यवहार के सिस्टम को सुधारने की कोशिश की, जहर देकर मार दिए गए. अब मोदी देश के सबसे पसंदीदा खेेल के सिस्टम को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, सो जाहिर है उन्हें भी किनारे लगा दिया जाएगा.
भारत की संस्कृति की यही सबसे बड़ी खासियत हैं. हम न स्वयं सिस्टम को बदलने की कोशिश करते हैं, न ही किसी को यह सिस्टम बदलने देते हैं. सो, मोदी की रवानगी तो तय है...

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