मंगलवार, 29 जून 2010

सितारे जमीं पर..


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विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं.

यह 2008 में भारतीय टीम के आॅस्टेªलिया दौरे की बात है, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दिल्ली से खेलने वाले छह फुट चार इंच लंबे ईशांत शर्मा ने कंगारूओं को उनकी ही सरजमीं पर चारों खाने चित्त कर दिया था. खासकर पर्थ टेस्ट में ईशांत का जादू सर चढ़कर बोला था, जब उन्होंने विकेट के दोनों तरफ स्वींग लेतीे अपनी गेंदों से रिकी पोटिंग जैसे महानतम बल्लेबाज को भी चकित कर दिया था. उस पूरे दौरे में ईशांत ने 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रप्तार से गेंदबाजी की थी, जिससे प्रभावित होकर आॅस्टेªलियाई क्रिकेट के सर्वकालिक महानतम कप्तानों में शुमार होने वाले स्टीव वाॅ ने भी इस तेज गेंदबाज को भारतीय टीम का ‘भविष्य’ करार दिया था.

लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. ऐसे वक्त में, जबकि 2011 में एशिया में होने वाले विश्वकप को सालभर भी नहीं बचा है, ईशांत शर्मा भारतीय टीम में खेलने के आसपास भी नहीं है. ईशांत ही नहीं, आरपी सिंग, एस श्रीसंथ, मुनफ पटेल और इरफान पठान जैसे गेंदबाजों का भी यही हाल है. ये सभी कभी न कभी भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकते सितारे थे. अपनी रप्तार और स्वींग खाती गेंदों से इन सभी ने विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को भी पैवेलियन भेजा था. 2007 के दक्षिण अÚीका दौरे पर अपनी रप्तार से सबको चैंकाने वाले श्रीसंथ इसके बाद से अब तक भारतीय टीम के लिए 17 टेस्ट और 49 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. कभी कपिलदेव के समकक्ष करार दिए गए इरफान पठान भारत के लिए 29 टेस्ट और 107 एकदिवसीय मैच खेल चुके हैं. वहीं, अपनी स्वींग गेंदबाजी से भारतीय टीम को विदेशी मैदानों पर कई यादगार जीतें दिलाने वाले आरपी सिंह अभी तक 13 टेस्ट और 55 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. इसी तरह भारत के लिए 12 टेस्ट और 43 एकदिवसीय मैच खेल चुके मुनफ पटेल को उनके करियर की शुरुआत में सटीक लाइन-लैंथ के चलते ग्लैन मैग्राथ की तरह का गेंदबाज माना गया था.

लेकिन हाल-फिलहाल ये सभी टीम से बाहर हैं. 2011 के बहुप्रतीक्षित विश्वकप से पहले दुनिया की अन्य टीमों की तरह ही भारतीय क्रिकेट के लिए भी यह तैयारियों का दौर है. लेकिन विश्वकप के लिए तैयार की जा रही टीम में इन सभी गेंदबाजों का नाम दूर-दूर तक भी नहीं है. इसके लिए सीध्ेा तौर पर बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता एस. श्रीकातं जिम्मेदार है. तमिलनाडू से ताल्लुक रखने वाले ये महाषय शायद भारतीय टीम में सिर्फ तमिलनाडू के खिलाड़ियों को ही देखना चाहते हैं. तभी, तो जिम्बाब्वे के लिए चुनी गई टीम में तमिलनाडू के बल्लेबाज मुरली विजय को तो आराम से जगह मिल गई, लेकिन इरफान पठान सहित भारत के ये सभी युवा गेंदबाज एक मौके के लिए भी तरस गए. हाल ही में भारतीय चयनकर्ताओं ने तीन अलग-अलग दौरों के लिए टीम का चयन किया- इंग्लैंड दौरे के लिए ए टीम का, जिम्बाब्वे दौरे के लिए सुरेश रैना की अगुवाई में युवा टीम का और श्रीलंका में खेले जाने वाले एशिया कप के लिए सबसे मजबूत टीम का. इन तीनों टीमों के लिए चयनकर्ताओं ने दर्जनभर तेज गेंदबाजों का चयन किया, लेकिन उनमें भी पठान, श्रीसंथ, मुनफ पटेल और ईशांत शर्मा का नाम नहीं था. चयनकर्ताओं के इस फैसले के चलते कई सवाल खड़े हो गए हैं. ऐसे में, जबकि दूसरे देश विश्वकप के लिए अपने सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं, भारतीय चयनकर्ताओं ने इन अनुभवी गेंदबाजों को नजरअंदाज क्यों किया हुआ है ?

हालांकि इसका जवाब इन खिलाड़ियों के हालिया प्रदर्शन में छुपा हुआ है. गौरतलब है कि करियर की शुरुआत में करिश्माई प्रदर्शन करने वाले इन सभी गेंदबाजों के हालिया प्रदर्शन में खासी गिरावट दर्ज की गई है. चोटों से जूझते करियर के बीच न सिर्फ इन गेंदबाजों की रप्तार में कमी आई है, बल्कि बल्लेबाजों के मन में खौफ पैदा करने वाली स्वींग भी कहीं खो गई है. इसी के चलते कभी भारतीय गेंदबाजी के अगुवा रहे ये गेंदबाज अपनी लय पूरी तरह खो चुके हैं, जिसका उदाहरण हाल ही में आईपीएल में भी देखने को मिला.

फिर भी, विश्वकप से ठीक पहले 40 से ज्यादा एकदिवसीय मैच खेल चुके इन सभी गेंदबाजों को नजरअंदाज करना किसी भी मायने में सही नहीं है. पूर्व चयनकर्ता और विकेटकीपर किरण मोरे के मुताबिक- ‘कुछ महीने पहले तक ये सभी गेंदबाज भारतीय आक्रमण के अगुवा थे, लेकिन अब वे संभावित 60 खिलाड़ियों में भी नहीं है.’ खास बात यह है कि ये सभी गेंदबाज 27 साल से कम उम्र के हैं, साथ ही इनके पास भारतीय मैदानों पर अच्छे प्रदर्शन का अनुभव भी है.

इसीलिए चयनकर्ताओं के फैसले को क्रिकेट गलियारों में एकमत से गलत ठहराया जा रहा है. भारत के पूर्व गेंदबाज मनोज प्रभाकर के मुताबिक- ‘ये ठीक है कि इनका हालिया प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. लेकिन विश्वकप के लिए नए गेंदबाज तैयार करने से बेहतर यह है कि इन्हें ही फाॅर्म में आने का मौका दिया जाए.’

वैसे, हाल-फिलहाल तो चयनकर्ता इस तरह की दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं है. इसीलिए कई वरिष्ठ खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी के बावजूद इन युवा तेज गेंदबाजों को जिम्बाव्बे दौरे पर नहीं भेजा गया. मोरे कहते हैं- ‘भारतीय टीम के पास फिलहाल जहीर खान और आशीष नेहरा ही बचे हैं. इनमें से भी नेहरा अक्सर चोटिल होते रहते हैं. ऐसे में भारतीय टीम की विश्वकप को लेकर तैयारियां अध्ूरी ही प्रतीत होती हैं.’ बात सही भी है. और इसमें भी संदेह नहीं कि चयनकर्ताओं की गलत नीतियों के चलते विश्वकप से ठीक पहले खराब पफार्म से जूझ रहे इन युवा गेंदबाजों को भी अपनी लय हासिल करने का मौका नहीं मिल पा रहा है.


बुधवार, 28 अप्रैल 2010

ललित मोदीः परिकथा पर विराम

यह 2004 की बात है, जब राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राज्य की क्रिकेट बिरादरी के लिए एक भव्य पार्टी दी थी. उस पार्टी में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की कई ‘हाई-प्रोफाइल’ शख्सियतों के साथ ही ललित कुमार मोदी नामक एक सांवला, दुबला-पतला शख्स भी मौजूद था. उस पार्टी में मौजूद लोगों के मुताबिक मोदी नामक यह शख्स उस वक्त दूसरों की नजर में आने की भरसक कोशिश कर रहा था, लेकिन कई ‘हाई-प्रोफाइल’ मेहमानों की मौजूदगी के चलते उसे किसी ने भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी.
सो, आज वे सभी व्यक्ति, जिन्होंने उस वक्त मोदी को नजरअंदाज किया था, पछता रहे हैं. 2004 की गुमनामी के दौर को पीछे छोड़ते हुए ललित मोदी आज देश के सबसे चर्चित व्यक्ति बन बैठे हैं. कुछ दिनों पहले तक क्रिकेट की दुनिया पर उनका एकछत्र राज था. मुकेश अंबानी, विजय माल्या जैसे उद्योगपति उनके साथ बैठने में गर्व महसूस करते थे, तो शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और शिल्पा शेट्टी जैसे बाॅलीवुड सितारे भी उनके सम्मोहन में खींचे चले आते थे. क्रिकेट कमेंटेटर हर्षा भोगले के मुताबिक- ‘कैरी पैकर के बाद मोदी क्रिकेट के इतिहास के सबसे ताकतवर व्यक्ति के तौर पर सामने आए हैं.’
लेकिन आईपीएल के तीसरे संस्करण में सट्टेबाजी और भ्रष्टाचार का दीमक लगने के बाद मोदी का जादू अब उतार पर है. बीसीसीआई ने मोदी के पर कतरने की पूरी तैयारी कर ली है. मुश्किलों के इस झंझावत में शरद पवार जैसे उनके कट्टर समर्थक भी दूर जा खड़े हैं. ऐसे में, यह जानना दिलचस्प रहेगा कि आखिर 2004 की गुमनामी के दौर को पीछे छोड़ते हुए मोदी देश के सबसे चर्चित व्यक्ति कैसे बन बैठे?
मोदी का यह सफर 2004 के आखिर में राजस्थान के नागपुर जिला एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने की साधारण घटना से शुरू हुआ. तब तक मोदी क्रिकेट के गलियारों में एक गुमनाम शख्सियत थे, जिनका नाम राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष किशोर रूंगटा ने भी नहीं सुना था. रूंगटा परिवार का उस वक्त राजस्थान क्रिकेट में एकछत्र राज था. तब रूंगटा ने राजस्थान एसोसिएशन के सचिव राजेंद्रसिंह नन्दू से मोदी के बारे में पूछा, तो राजेन्द्रसिंह का जवाब था- ‘आप चिंता मत करिए, मोदी अपने ही ग्रुप का आदमी है, आगे बहुत काम आएगा.’
लेकिन, फरवरी 2005 में मोदी ने राजस्थान एसोसिएशन के चुनावों में किशोर रूंगटा को करारी शिकस्त देकर उनके चालीस साल के प्रभुत्व को जमींदोज कर दिया. इसके बाद तो मोदी ने जिस चीज को भी छुआ, सोने में तब्दील कर दिया. अपना दायरा बढ़ाते हुए उन्होंने बीसीसीआई के भीतर अपना प्रभुत्व कायम किया और बाद में उपाध्यक्ष की कुर्सी तक भी पहुंचे. लेकिन निर्विवाद रूप से, आईपीएल मोदी की जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी है. एक ऐसी लीग, जिसने सैकड़ों क्रिकेटरों की जिंदगी को बदल दिया.
आंकड़ों के मुताबिक आईपीएल तीन साल में ही पंद्रह हजार करोड़ रुपए के साम्राज्य में तब्दील हो गया है. लेकिन इस साम्राज्य को रचने वाले मोदी की विदाई हो चुकी है. यकीनन, मोदी ने जिस तेजी से ऊपर की छलांग लगाई, उसी तेजी से उन्हें नीचे भी धकेल दिया गया.

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मोदी का जाना तो तय है..



आईपीएल समाप्ति पर है और इसी के साथ ललित मोदी का स्वर्णिम काल भी खत्म होता नजर आ रहा है. तीन साल पहले, 2008 में, विश्व क्रिकेट को आईपीएल की अनूठी सौगात देकर इतिहास के पन्नों में सुनहरों अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराने वाले मोदी को अब एक खलनायक की तरह रूखसत करने का प्रयास किया जा रहा है. उनके खिलाफ बीसीसीआई है, क्रिकेट के मैदान में जलवे बिखेर चुके कईं भूतपूर्व खिलाड़ी हैं. यहां तक कि भारतीय राजनीति में भी इन दिनों ललित मोदी को बर्खास्त किए जाने की मांग ही सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. राजनेता हो या राजनीतिक पार्टियां, बीसीसीआई के आला अधिकारी हो या पिफर भूतपूर्व खिलाड़ी, हर कोई इन दिनों मोदी को एक खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करने की मुहिम में जुटा हुआ है. सबकी राय एक जैसी ही हैः मोदी एक भ्रष्टाचारी है, जिन्होंने क्रिकेट और आईपीएल में भ्रष्टाचार किया है. सो, उन्हें आईपीएल के चैयरमेन की कुर्सी पर बैठे रहने का कोई हक नहीं है.
तो क्या हकीकत में ऐसा है? क्या मोदी ने वाकई में भारतीय क्रिकेट का इस कदर नुकसान कर दिया है कि उन्हें बर्खास्त करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ? जवाब होगा, नहीं. मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिससे भारतीय क्रिकेट बदनाम हो. और फिर अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया भी है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए. पहले उनके द्वारा किए गए अपराधों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, उसके बाद उन्हें पद से बर्खास्त करना चाहिए.
हाल फिलहाल तो मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने बरसों से सुस्त पड़ी बीसीसीआई को पुनर्जीवित करने का काम किया है. मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने आईपीएल जैसी पैसे बनाने वाली मशीन तैयार करके भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदलने की कोशिश की है. भारतीय खेलप्रेमियों को वह समय याद करना चाहिए, जब बीसीसीआई के पास अपने चयनकर्ताओं को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं हुआ करतेे थे. यह ज्यादा पुरानी बात नहीं, बल्कि पांच या छह साल पहले की बात है, जब देश की राष्ट्रीय टीम चुनने वाले चयनकर्ता भी अवैतनीक कर्मचारी की तरह काम करते थे. वहीं बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बन गया है, तो इसमें मोदी द्वारा रची गई आईपीएल की अहम भूमिका है. आज अगर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भारत में खेलने के लिए अपनी राष्ट्रीय टीमों को छोड़ रहे हैं, तो यह आईपीएल की वजह से ही है. आज अगर धेानी, सहवाग और युवराज जैसे खिलाड़ियों को आईपीएल में डेढ़ महीनें खेलने के एवज में पांच करोड़ रूपए मिल रहे हैं, तो यह भी मोदीे की आईपीएल की वजह से ही है.
लेकिन बीसीसीआई को यह रास नहीं आ रहा है. बीसीसीआई में बरसों से प्रभुत्व जमाएं बैठे उन उदासीन और निकम्मे पदाधिकारियों को यह रास नहीं आ रहा है कि मोदी नामक कोई शख्स उन्हें ‘सिस्टम’ सुधारने पर उतारू है. आजादी के बाद से भारत की सबसे बड़ी व्यथा यही है कि यहां पर सिस्टम को सुधारने की कोषिष करने वालों को कभी स्वीकार नहीं किया गया. फिर चाहे वह जयप्रकाश नारायण हो, रजनीश ओशो हो या फिर अब ललित मोदी. जयप्रकाश ने राजनीति का सिस्टम सुधारने की कोशिश की, किनारे लगा दिए गए. ओशों ने यौन व्यवहार के सिस्टम को सुधारने की कोशिश की, जहर देकर मार दिए गए. अब मोदी देश के सबसे पसंदीदा खेेल के सिस्टम को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, सो जाहिर है उन्हें भी किनारे लगा दिया जाएगा.
भारत की संस्कृति की यही सबसे बड़ी खासियत हैं. हम न स्वयं सिस्टम को बदलने की कोशिश करते हैं, न ही किसी को यह सिस्टम बदलने देते हैं. सो, मोदी की रवानगी तो तय है...

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

आईपीएलः सवालों के घेरे में



आईपीएल का तीसरा संस्करण अपने आखिरी दौर में पहुंच चुका है. टूर्नामेंट बेहद कामयाब है, करोड़ो-अरबों रूपए भी कमाएं है और प्रसारण के नजरिए से भी वह हिट है. बावजूद इन सबके, आईपीएल के आका ललित मोदी इन दिनों खुष होने के बजाए बौराएं हुए हैं. उनकी संासे अटकी हुई है और भविष्य उन्हें अंधकारमय नजर आ रहा है. इसकी वजह आईपीएल को लेकर देष में उठ खड़ा हुआ वह विवाद है, जिसने खेल जगत के साथ ही राजनीतिक गलियारों में भी नई बहस छेड़ दी है. यह बहस आईपीएल में बेनामी पैसे की मौजूदगी को लेकर उठ खड़ा है. जाहिर है, इसकी जद में सबसे पहले ललित मोदी को हीे आना था. सो, अब उन पर षिकंजा कसने की तैयारियां की जा रही है. इसके चलते आईपीएल के भव्य समापन पर ध्यान देने के बजाए अब मोदी खूद को बचाने की कोषिषों में जुट गए हैं. हालांकि वे अब भी दावें कर रहे हैं कि आईपीएल में उनके पद को लेकर कोई विवाद नहीं है. लेकिन अंदर की बात तो यहीे है कि आईपीएल के कमिष्नर मोदी को अपना सिंहासन डोलता नजर आ रहा है.
सवाल मोदी का नहीं है, बल्कि खेल में दाखिल हो चुके भ्रष्टाचार का है. यह सारा मामला सुर्खियों में तब आया, जब यूपीए सरकार के विदेष राज्यमंत्री शषि थरूर की एक करीबी महिला मित्र के आईपीएल में पैसा लगाने की बात सामने आई. सुनंदा पुष्कर नामक इस महिला के आईपीएल में नई टीम के तौर पर सामने आई कोच्चि में 60 करोड़ से भी ज्यादा के शेयर होने की बात सामने आई. दक्षिण अफीका में रह रही कष्मीरी मूल की इस महिला के साथ थरूर के शादी करने की बातें कही जा रही थी,, जिसके चलते ही मामलें ने इस कदर तूल पकड़ा.
अब थरूर इस विवाद के चलते यूपीए सरकार में अपनी नौकरी गंवा चुके हैं और आयकर विभाग ने ललित मोदी पर भी षिकंजा कस दिया है. लेकिन अभी भी कईं सवाल ऐसे है, जिनके जवाब सामने आने चाहिए.
सबसे पहले तो आईपीएल को पूरी तरह से पारदर्षित किया जाना चाहिए. वर्तमान में आईपीएल की आठ टीमों में मुकेष अंबानी,, विजय माल्या, रेड्डी बंधुओं सहित देष की कई चर्चित और अमीर शख्सियतों का पैसा लगा है. लेकिन इन टीमों में कई गुमनाम शेयरधारकों का भी पैसा लगा है. सबसे पहले इन सभी की सच्चाई सार्वजनिक की जानी चाहिए. बताया जा रहा है कि ललित मोदी के कईं रिष्तेदारों ने भी राजस्थान रायल्स और पंजाब की टीमों में पैसा लगाया है. तो फिर जांच होनी चाहिए कि क्या इन लोगों को मोदी का रिष्तेदार होने का फायदा तो नहीं मिला है. आरोप यह भी उठ रहे हैं कि मोदी ने आईपीएल के मैच फिक्स कराके करोड़ों रूपए के वारे-न्यारे कर लिए हैं. अगर ऐसा है तो सबसे पहले मोदी पर षिकंजा कसना चाहिए.
एक अनुमान के मुताबिक आईपीएल अपने तीसरे ही साल में पंद्रह हजार करोड़ रूपए के साम्रााज्य में तब्दील हो गया है. एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका के मुताबिक आईपीएल दुनिया का सबसे ज्यादा फलने-फूलने वाला खेल संस्थान बन गया है. तो फिर ऐसे में चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है. कहीं यह बेनामी पैसे के बल पर तो नहीं है. जाहिर है, सबसे पहले इन सवालों के जवाबों का पता लगाए जाने की जरूरत है.

फिल्मों पर भारी खेल का मजा


लगातार तीसरे साल आईपीएल के चलते बाॅलीवुड को करोड़ों रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है. बड़े बजट और सितारों से सजी दर्जनभर फिल्में आईपीएल के चलते हुई नाकाम.
मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह एक ऐसी चुनौती है, जिसे लेकर वह पहले से ही पूरी तैयारी में थी. बावजूद इसके, पहले दो संस्करणों की तरह ही आईपीएल का तीसरा सत्र भी इंडस्ट्री के लिए ऐसी चुनौती बनकर उभरा है, जिसने एक बार फिर उसे करारी शिकस्त दी है. 12 मार्च को आईपीएल के आगाज के बाद से हीे देशभर के सिनेमाघरों में विरानी छाई हुई है और बड़े निर्माता और फिल्म कंपनियां अपनी फिल्मों की तारीख आगे बढ़ाने पर मजबूर हो गई हैं. और जिन छोटे व मध्यम श्रेणी के निर्माताओं ने आईपीएल के इस सीजन में अपनी फिल्में रिलीज करने का साहस जुटाया, वे अब टिकट खिड़की पर कमाई के आंकड़ों को देखकर अपने फैसले पर आंसू बहा रहे हैं. हरेक साल दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली इंडस्ट्री की हाल-पिफलहाल तो यही नियति है.
वैसे तो आईपीएल का पहला सत्र ही इंडस्ट्री के लिए एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा था. 2008 में आईपीएल के आगाज के साथ ही बाॅलीवुड को करारा झटका लगा था, जब कई बड़े बजट की फिल्में अच्छी होने के बावजूद टिकट खिड़की पर औंध्ेा मुंह गिरी थी. इसके बाद 2009 में भी वही कहानी दोहराई गई. 2009 में तो निर्माताओं और वितरकों के बीच मुनाफे को लेकर दो महीने तक चली रस्साकशी के चलते हालात और ज्यादा खराब हो गए थे. फिल्म विश्लेषक कोमल नाहटा के मुताबिक- ‘पिछले दो साल में आईपीएल के चलते इंडस्ट्री को करोड़ों रुपए का नुकसान उठाना पड़ा. इससे भी बढ़कर उन दर्जनों नए निर्देशकों और कलाकारों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया, जो आईपीएल के दौरान रिलीज हुई अपनी फिल्मों के साथ इंडस्ट्री में धमाकेदार करियर की आस लगाए बैठे थे.’
और अब, आईपीएल के तीसरे संस्करण में भी यही कहानी देखने में आ रही है. आईपीएल का यह तीसरा सत्र 12 मार्च से शुरू हुआ और संयोग से इसी दिन शुक्रवार था. सो, इसी दिन से बाॅलीवुड का आईपीएल से शिकस्त का सिलसिला भी शुरू हो गया. 12 मार्च को ही टिकट खिड़की पर एक साथ चार फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें से दो फिल्में राइट या रांग और हाइड एंड सिक बड़े सितारों और बड़े बैनर की पिफल्में थीं. सुभाष घई के बैनर तले रिलीज हुई राइट या रांग में सन्नी देओल, इरपफान खान और कोंकणा सेन जैसे बड़े सितारे थे, जबकि हाइड एंड सिक निर्माता-निर्देशक अपूर्व लखिया के बैनर की फिल्म थी. इसके बावजूद दोनों ही फिल्में आईपीएल के चलते टिकट खिड़की पर कोई भी प्रभाव छोड़ने में नाकामयाब रही. इसके बाद मार्च और अप्रैल में वेलडन अब्बा, हम तुम और घोस्ट, अतिथि तुम कब जाओगे, शापित जैसी कई बड़े बैनर और सितारों की फिल्में रिलीज हुईं, लेकिन भारतीय दर्शकों के बीच आईपीएल की दीवानगी के चलते सभी टिकट खिड़की पर नाकाम ही साबित हुई.
जाहिर है, बाॅलीवुड का जादू हर बार आईपीएल के सामने फीका पड़ जाता है. तो इसकी सबसे बड़ी वजह क्या है? इस बारे में नाहटा का मानना है- ‘चूंकि आईपीएल घर बैठे उपलब्ध हो जाने वाला मनोरंजन है, इसलिए दर्शक सिनेमाघरों में आकर फिल्में देखने के बजाए अपने परिवार के साथ घर पर ही बैठकर मैच देखना पसंद करते हैं.’ इसके साथ ही एक दूसरी बड़ी वजह यह भी है कि देश में लोकप्रियता के मामले में क्रिकेट अभी भी फिल्मों से कई कदम आगे है. फिल्म अभिनेता सुनील शेेट्टी के मुताबिक- ‘भले ही इसे हजम कर पाना मुश्किल हो, लेकिन पिछले तीन सालों से सबसेे बड़ी सच्चाई यही है कि आईपीएल बाॅलीवुड का सबसे कट्टर प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है.’ सुनील शेट्टी की फिल्म तुम मिलो तो सही आईपीएल के दौरान ही मार्च को रिलीज हुई. नतीजतन उनकी फिल्म का भी वही हश्र हुआ. आलोचकों से अच्छी प्रतिक्रिया के बावजूद दर्शक सिनेमाघरों से नदारद ही रहे. वहीं, आईपीएल के मैचों का समय भी बाॅलीवुड के लिए मुश्किल चुनौती साबित हुआ. इस साल के आईपीएल के सभी मैच 4 बजे से शुरू हुए. ऐसे में जिस दिन, दो-दो मैच थे, तो आईपीएल का प्रसारण रात के बारह बजे तक जारी रहा. आमतौर पर पिफल्मों की ज्यादातर कमाई शाम और रात के शो से ही होती है, लेकिन आईपीएल के दौरान दर्शक रात में सिनेमाघरों से दूर ही रहे.
इसी के चलते, अब बाॅलीवुड आईपीएल की चुनौती से निपटने की कोशिशों में जुट गया है. ज्यादातर निर्माता अपनी फिल्मों की रिलीज को आगे बढ़ा चुके हैं. ऐसे ही एक निर्माता-निर्देशक दीपक बलराज विज हैं, जिन्होंने जैकी श्राॅफ अभिनीत साईं बाबा पर आधरित अपनी फिल्म की रिलीज को कई महीने पीछे धकेल दिया है. बलराज विज के मुताबिक- ‘आईपीएल के दौरान फिल्म रिलीज करने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि भारतीय दर्शक हमेशा ही फिल्मों पर क्रिकेट को प्राथमिकता देते रहे हैं.’ पच्चीस से ज्यादा अन्य फिल्मों की रिलीज तारीख भी कई महीने आगे बढ़ा दी गई है.
लेकिन दिक्कतें इससे खत्म नहीं हो जाती. 25 अप्रैल को आईपीएल के समापन के बाद 31 अप्रैल से ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्वकप शुरू हो जाएगा. इसके बाद दक्षिण अÚीका में फुटबाॅल का विश्वकप आयोजित होना है.
फिलहाल तो बाॅलीवुड आईपीएल की गहरी मार से ही जूझ रहा है. मात्र तीन साल में ही आईपीएल को पंद्रह हजार करोड़ रुपए के साम्राज्य में तब्दील कर देने वाले ललित मोदी को बाॅलीवुड पर भी नजरें इनायत करने की सख्त जरूरत है.